Pages

Sunday, September 28, 2014

"देशै नरहन सक्छ।" हो र?


हिजो प्रधान मंत्री सुशील कोइरालाले यहाँ न्यु यॉर्कको सनीसाइडको कार्यक्रममा "नेपालभन्दा पनि उग्र" भन्नुभो, "देशै नरहन सक्छ" भन्नुभो। बड़ो व्यवस्थित कार्यक्रम थियो। सीके राउतको मुद्दामा प्रोटेस्ट गर्नेहरुले पनि बड़ो व्यवस्थित ढंगले आफ्नो कुरा राखे। होहल्ला गर्ने मनसाय थिएन, भएन पनि। एक जना प्रमुख वक्ता जनजाति महासंघका लुईसंग वाईबाले मन्चबाट नै भन्नु पर्ने कुरा भन्दिए पछि प्रोटेस्ट असंयमित हुने कुरै भएन।

देशै नरहने भनेको के? भारत एशियाबाट उछिट्टिएर नेपाल समुद्रमा पुग्ने भनेको होइन होला। नेपाललाई भारत अथवा चीनले कब्ज़ा गर्ने कुरा गरेको होइन होला। भनेपछि देशलाई खतरा प्रकृतिबाट छैन, छिमेकीबाट छैन भने खतरा आयो कहाँबाट?

देशै नरहने भनेको देश टुक्रिन्छ भनेको हो? राजा महेन्द्र, राजा वीरेन्द्र र राजा ज्ञानेन्द्रका पालामा सुशील कोइराला र सुशील कोइराला जस्ता थुप्रै लोकतन्त्रका सेनानीहरुलाई "अराष्ट्रिय तत्व" को संज्ञा दिइएको हो। त्यति बेला लोकतन्त्र चाहनेहरुलाई त्यसरी नै गाली गरिन्थ्यो। अहिले त्यही सुशील कोइरालाले संघीयता चाहनेहरुलाई त्यसै लवजमा यसरी गाली गर्नु कहाँसम्मको ठीक कुरा हो?

पंचायती व्यवस्थाभन्दा लोकतंत्र बढ़ी राष्ट्रवादी हो किनभने लोकतन्त्रमा सार्वभौमसत्ता जनतामा निहित रहन्छ न कि एक व्यक्ति राजामा। त्यस्तै संघीयताबिनाको नेपालभन्दा संघीयता भएको नेपाल बढ़ी बलियो नेपाल हो। संघीयताबिनाको नेपाल बरु टुक्रिने सम्भावना बढ़ी हुन्छ किनभने संघीयताबिनाको नेपालमा सबैलाई उकुसमुकुस भइराखेको हुन्छ। भइराखेको छ पनि। संघीयता भएको नेपालमा विभिन्न समुदायले समानता र अवसर पाउने संभावना बढेर जाने भएकोले त्यो नेपाल टुक्रिने सम्भावना कम भएर जान्छ।

पंचायतलाई पनि त पंचायती प्रजातंत्र भनिन्थ्यो। अझ नेपालको माटो सुहाउँदो पंचायती प्रजातंत्र भनिन्थ्यो। पछि त त्यो सुधारिएको पंचायती व्यवस्था भयो जहाँ कि वोट खसाल्न पनि पाउने भयो। तर खोइ गिरिजा कोइरालाले चुनाव लड़ेनन त। किनभने त्यो लोकतंत्र थिँदै थिएन।

त्यस्तै अहिले नेपालमा सत्तामा रहेका थुप्रैले जे कुरा संघीयता हुँदै होइन त्यसलाई संघीयता भनिरहेका छन। संघीयता के हो भन्ने कुरा पछि गरौं, पहिला के होइन भन्ने पट्टी जाऊँ।

संघीयता भनेको देश तोड्ने होइन, त्यसको उल्टो हो। संघीयता भनेको देश जोड़ने हो। धान रोपेकोलाई धान काटेको भन्न मिल्दैन। त्यस्तै संघीयतालाई देश तोड़ेको भन्न मिल्दैन। संघीयता भनेको विकेन्द्रीकरण होइन। यो प्रशासनिक कुरा होइन। तर संघीयतामा power devolution हुन्छ र व्यापक रुपमा हुन्छ। संघीयता भनेको वामदेव र सुशीलको "निगाह" बाट जनताले पाउने कुरा होइन। लोकतन्त्र जस्तै संघीयता पनि जनताको अधिकार हो। र जसरी निर्दलीय प्रजातन्त्र भनेको प्रजातन्त्र होइन, जोक हो, ठट्टा हो, त्यस्तै संघीयता भनेकै आत्म अधिकार भएको संघीयता हो। आत्म अधिकार बिनाको संघीयता त संघीयता नै होइन।

स्कॉटलैंडमा भएको जनमत संग्रहले ब्रिटेनलाई झनै बलियो बनाएको छ। आत्म निर्णयको अधिकारले ब्रिटेनलाई झनै बलियो बनाएको छ। लोकतन्त्रमा राष्ट्रियता अझै बलियो भएर जान्छ, संघीयताले सच्चा राष्ट्रीयताको निर्माण गर्छ।

बहुदल आए देशै नरहन सक्छ भन्नेहरु थिए। सुशीलको भाषा तिनीहरुसँग किन मिलेको?


Free CK Raut Campaign At Modi's Speech Venues In New York


















Madhesi Kranti (3) On The Way


इसमें संगठन विस्तारका काम बहुत जरुरी है। मधेश स्वराजका माँग अहिंसात्मक है और सदैव रहेगा, और वो conditional है। अगर मधेसीके विरुद्ध विभेद खतम ना हो तो उस रास्ते पर आगे बढ़ना है।

तराईके गाओं गाओंमें, शहर शहरमें संघर्ष समिति बनाना बहुत जरुरी है। आशा ये है कि इस चेतावनीके डरसे अनिश्चितकालीन बंद शुरू होनेसे पहले ही वो सीकेको रिहा कर दें। लेकिन उसकी संभावना बहुत कम है जैसे कि मेरेको लगता है। तो बात आगे बढ़ेगी।

अनिश्चितकालीन बंदका माँग स्पष्ट होना बहुत जरुरी है। पहला माँग तो सीकेकी रिहाईकी ही है। लेकिन माँगे बढ़ेंगे।

अगर एक भी शहीद पैदा हो तो गृह मंत्रीके राजीनामाकी माँग थप दी जाएगी। अगर १० से ज्यादा शहीद होते हैं तो प्रधान मंत्रीके राजीनामाके वगैर बन्द ख़त्म नहीं होगी। अगर बन्द ५ दिनसे उपर हो जाए तो नए संविधानमें (१) एक मधेस दो प्रदेश (चितवन से कंचनपुर एक, बीरगंजसे झापा तक दुसरा) (२) आत्म निर्णयके अधिकारकी गारण्टी मांगी जाएगी।

ये जो संगठन निर्माण हो रहा है, उसकी पवित्रताको कायम रखा जाएगा। पुर्ण आन्तरिक लोकतंत्रवाली एक नयी पार्टीका निंब रखा जा रहा है। क्रान्तिके बाद बाहरसे लाके उपरसे नेताओको थोपा नहीं जायेगा। संगठनमें आइए और आतंरिक चुनाव जितिये, पार्टी प्रवेशका वही एक तरीका है।

मधेश अलग देश होनेका रोडमैप है कि ये पार्टी मधेशके दोनो प्रदेशोंमें बहुमत लावे। उसके बाद जनमत संग्रह करे। उस जनमत संग्रहमें अगर मधेश अलग देशवाले मुद्देको बहुमत मिलती है तो मधेश अलग हो गया।

लेकिन अगर पहाड़ी अदालत सीकेको आजीवन कारागार या ऐसी कोइ सजा सुनाती है तो ये क्रान्ति मधेशके अलग देशकी घोषणा खुद करेगी। शायद ऐसी नौबत न आए।

पुर्ण आन्तरिक लोकतन्त्र वाली पार्टी

  1. पार्टीके केन्द्रीय अध्यक्षको पार्टी महाधिवेशनमें बहुमतके आधार पर चुना जाएगा। अध्यक्षके उम्मीदवारको ५०% से ज्यादा मत लाने होंगे।
  2. ३१ केंद्रीय समिति सदस्य होंगे। उनको भी पार्टी महाधिवेशनमें चुना जाएगा। पार्टी कार्यकर्ता मतदान करेंगे। 
  3. ५ पदाधिकारी होंगे। उपाध्यक्ष, महासचिव, कोषाध्यक्ष, संगठक। अध्यक्ष। 
  4. प्रत्येक संसदीय क्षेत्रमें एक क्षेत्रीय समिति होगी। आन्तरिक निर्वाचनद्वारा चुना गया व्यक्ति क्षेत्रीय अध्यक्ष होगा, और चुनावमें टिकट भी उसीको मिलेगा। टिकट पार्टी अध्यक्ष या केंद्रीय समिति वितरण नहीं करेंगे। 
  5. पार्टीके आय व्ययका पैसे पैसेका हिसाब पार्टीके वेबसाइट पर रखा जायेगा। जो डोनर नाम न खुलाना चाहें उनका नाम ना खुलाया जाएगा। 
  6. स्थानीय चुनावमें टिकटका वितरण भी उसी तरह किया जाएगा, उपरसे टिकट वितरण नहीं किया जाएगा। 
  7. पार्टीका नाम मधेश स्वराज पार्टी रखा जा सकता है। मापदण्ड होगी। कि १० सालके अन्दर मधेसीयोंको नेपाल सरकारके संयन्त्रोमें समानुपातिक सहभागिता नहीं मिलती है तो अलग देश बनानेकी पहल की जाएगी। समानुपातिक बनानेके ढेर सारे तरीके हैं। समानुपातिकताका पहला मुद्दा तो है कि ४० लाख मधेसी जो कि नागरिकता पत्रसे वञ्चित किए गए हैं उनको नागरिकता पत्र वितरण करो। अगर देशसे अलग होना प्रमुख उद्देस्य रहता तो ये माँग उठाते क्या? मधेसको अलग देश बनानेकी इच्छा रखनेवाले वो हैं जो ४० लाख मधेसियोको नागरिकता पत्रसे वञ्चित किए हुए हैं। समानुपातिकताका दुसरा मुद्दा है आरक्षण, इसका कानुनी प्रावधान हो गया है, लेकिन इसको लागु नहीं किया जा रहा है, जैसे कि नेपाल सेनाने इस ४९% आरक्षणके प्रावधानको माना ही नहीं है। नेपाल सेना संसदके आदेशको न माने ये तो पाकिस्तानी स्टाइल हो गया। नेपाल सेना नेपालके संसदसे उपर है क्या? नेपाली कांग्रेसके "लोकतंत्रवादियो"को ये बात अखडती क्यों नहीं? समानुपातिकताका तीसरा मुद्दा है downsizing का। नेपाल सेनाकी संख्या १००,००० से घटाके १०,००० पर लाना है। नेपाल पुलिसकी संख्याको घटाके १००,००० से ३०,००० पर लाना है। संघीय नेपालमें पुलिस तो सभी राज्यके अपने अपने रहेंगे। कुछ मंत्रालयको dissolve करना है। सभीको downsize करना है। बस इन तीन अस्त्रोके प्रयोगसे नेपालको एक रखा जा सकता है। 


Right To Self Determination: Where CK Raut And The Madhesi Parties Meet


Federalism without the right to self determination is like democracy without political parties. We have tried that one in Nepal. It was not exactly democracy.

The Madhesi parties do not agree with CK Raut's idea of Madhesh as a separate country. But there is no way they can not agree with the idea of the right to self determination. That is where CK Raut and the Madhesi parties meet.

Friday, September 26, 2014

दुर भविष्यका मधेश, समृद्ध मधेश


दुर भविष्यका मधेश एक समृद्ध मधेश है। पुर्व पश्चिम बिजली रेल है, बुलेट ट्रेन। चीनके बेइजिंगसे ल्हासा होते, सिक्किमके रास्ते ये ट्रेन तराईमें मेचीसे महाकाली जाती है, और उससे आगे दिल्ली पहुँचती है। भारतकेजो उत्तर पुर्वके लोग हैं उन्हें दिल्ली जाना हो तो वो इसी रास्ते जाते हैं। ये बुलेट ट्रेन ६०० मील, यानि १,००० किलोमीटरका ये रास्ता तीन घंटेमें पार करती है।

पुरानावाला महेन्द्र राजमार्ग फोर लेन टु वे हाईवे बन गया है। हुलाकी राजमार्ग भी फोर लेन टु वे हाईवे बन गया है। ढेर सारे उत्तर दक्षिण रोड हैं। मधेशके प्रत्येक बस्तीतक सालमें १२ महिने चल्नेवाली पक्की सड़क है। मधेशमें उगाए गए सब्जियाँ युरोप तक पहुँचती है।

ये जो प्रमुख सड़के बनी, रेल लाइन बिछी, वो सब BOOT (Build Own Operate Transfer) के सिद्धांत पर, विश्व पुंजी बाजारसे पैसा लाकर।

अभी जिस तरह सब जगह FM रेडियो है, भविष्यके मधेशमें सब जगह वायरलेस इंटरनेट उपलब्ध है और उसके लिए नेपाल सरकार या मधेश सरकारको कुछ करना भी न पड़ा। Google और Facebook ने आकाशसे drone के माध्यमसे वो मुफ्तमें ला दिया। वैसे सब जगह Fiber Optic नेटवर्क बिछाया गया है। कंप्यूटर बिज्ञानमे पारख मधेसी युवा मधेशमें बैठके दुनिया भर बिज़नेस व्यापार करते हैं और उससे देश और राज्यको बहुत टैक्स मिलती है।

मधेशमें भी एक औद्योगिक क्रान्ति होती है, लेकिन वो अमेरिका, ब्रिटेन या चीनवाली गन्दी क्रान्ति नहीं बल्कि एक Clean Energy पर आधारित, क्यों कि नेपालमें ५०,००० मेगावाट बिजलीका उत्पादन हो गया है और मधेशके किसी भी फैक्ट्रीसे धुँवा निकलता ही नहीं। १० मेगावाटसे बड़ा सभी हाइड्रो प्रोजेक्टको केंद्रीय सरकारके मातहत रखा गया है, और इससे मधेशको बहुत नाफा हुआ है। सन २०१५ में सभी मधेसी पार्टी एक हो गए, लगभग १४ पार्टी, और उन्होने अपना नाम भी बदला, और पहाड़में भी उन्होने संगठन विस्तार किया। उस पार्टीने केंद्रमें अकेले अभी तक दो बार सरकार बना लिया है।

दक्षिण एशियाका आर्थिक एकीकरण भी हो गया, और हिंदीको UN का छठा भाषा भी मान लिया गया। भारत और पाकिस्तानके बीच जबसे बॉर्डर खोल देने तककी शान्ति आ गयी तबसे पुरी दक्षिण एशिया आर्थिक रूपसे यूरोपसे प्रतिस्प्रधा कर रही है।

इतना २० सालके अंदर किया जा सकता है।