वार्ता का औचित्य ही नहीं

२०४६ में जब आंदोलन हुवा तब वार्ता हुवा था? मोलमोलहै हुवा था? गणेशमान ने कहा बहुदल, तो वीरेंद्र ने कहा देखिए बहुदल तो बहुत हो गया तीन दल पर आ जाइए। वैसा हुवा था? वार्ता का औचित्य ही नहीं है अभी।

वार्ता तब होता है जब कोई थपघट का संभावना हो। या बगैर मांग पुरा किए भी अगर आंदोलन फिर्ता लेनेका संभावना हो। तो यहाँ तो वैसा कोई संभावना है ही नहीं। ये सिद्धांत पर आधारित माँगे हैं। कोई जातीय मांग थोड़े है?

गणतंत्र के मुद्दे पर न माओवादी ने मोलमोलहै किया न ही राजा ने। मोलमोलहै किया किसने? गिरजा। बेबी किंग। बेबी किंग। बेबी किंग।


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