सिर्फ मधेस ही नेपाल में जल विद्युत का विकास कर सकता है

पहाड़ी शासक वर्ग बड़ा बड़ा प्रोजेक्ट होने ही नहीं देते हैं। कुछ भी करो तो नाखुश रहते हैं। अपना होमवर्क नहीं करते। Irrational Indophobia को अपने राजनीति का केंद्र विन्दु बना के बैठे हुवे हैं। खुद भ्रष्टाचार करते हैं, विकास का काम नहीं करते, जनता का काम नहीं करते, माफियावादी करते हैं, माफिया डॉन लोगों को पालतु कुत्ता बना के रखे हुवे हैं, लेकिन भारत को दो चार गाली दे दो तो पहाड़ की जनता उनकी वाहवाही करते हैं, उनके काम का कोइ हिसाबकिताब नहीं मांगते हैं। इस से एक अविश्वास की खाइ बनी रहती है। और उससे दो देश के बीच स्वस्थ cooperation हो नहीं पाता। सम्बन्ध तो है। युद्ध की कोइ संभावना नहीं है। नेपाल भारत में आतंकवादी नहीं भेजता। लेकिन productive relationship नहीं है। भारत के प्रति सकभर अविश्वास बढ़ाना जिन लोगों की राजनीति की रोजीरोटी हो वो भला क्या बड़े बड़े प्रोजेक्ट बनाएंगे? बनाने ही नहीं देते हैं।

मधेस में वो Indophobia नहीं है। मधेसी को नेपाली होने का गर्व है। अगर नेपाली होने का गर्व ना होता तो वो नेपाल के भितर समानता पाने की बात करते ही क्युँ? नेपाल में अगर २०-३० हजार मेगावाट जलबिद्युत निकालना है तो मधेसी को काठमाण्डु में सत्ता में आना बहुत जरुरी है। सिर्फ मधेस ही नेपाल में जल विद्युत का विकास कर सकता है। क्योंकि मधेसी भारत के प्रति अविश्वास का राजनीति नहीं करते।

बिहार और उत्तर प्रदेश को ट्रांसफॉर्म करने के लिए ये जरुरी है की नेपाल ३०,००० मेगावाट जलबिद्युत पैदा करे। बिहार और उत्तर प्रदेश को flood-free किया जा सकता है। आज मधेस के इस कठिन घडी में बिहार और उत्तर प्रदेश की जनता मधेस को साथ दे रही है। मधेसी का ये कर्तव्य बनता है कि वो काठमाण्डु का लोकतान्त्रिक कब्ज़ा कर के नेपाल में ३०-४० हजार मेगावाट जलबिद्युत निकाले और बिहार और उत्तर प्रदेश को कल में जा के मदत करे।

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