जनमत निर्माण के लिए संगठन

फरक मत और फरक विचार लोकतंत्र में सामान्य बात होती है। जितने मधेसी दल हैं सब का एजेंडा एक ही है। यहाँ तक की पर्सनालिटी भी बहुत फर्क नहीं है नेता लोगों का। तो फिर इतनी सारी पार्टियां क्युँ? मेरे को लगता है वो इसलिए कि नेपाल में जैसा अपरिपक्व लोकतंत्र है उस परिवेश में पार्टी अध्यक्ष होने का कुछ दुसरा ही मजा है। बड़े पार्टी का उपाध्यक्ष या महासचिव होने से ज्यादा मजे की बात है छोटे पार्टी का अध्यक्ष होना। लेकिन शक्ति तो क्षय हो रही है।

२००८ और २०१२ के चुनाव में वोट शेयर ज्यादा फर्क नहीं है मधेसी पार्टियो का लेकिन ३ से १३ पार्टी होने के कारण ८४ से घट के ५० पर आ गए। ३५ सीट का सीधा लॉस। मासिक ३५ लाख का घाटा सिर्फ तलब भत्ता में। लेकिन परिस्थिति तो देखिए। तीन बाहुन दल मिलके ऐसा संविधान लाए हैं कि मधेसी को दुसरे दर्जा का नागरिक बना दिए। अब कह रहे हैं मिल के ही आगे बढ़ेंगे। यानि अब जो संघीयता को कार्यान्वयन करना है उसमें और भी ज्यादा बेइमानी करेंगे। घर का गलत नक्शा पास किया। अब घर बनाते वक्त और ज्यादा नाइंसाफी की बात करने लगे हैं।

एक ही एकीकृत मधेसी जनजाति दल का निर्माण होना बहुत जरुरी है। यहाँ तक की सीके राउत को भी उसी में समाना चाहिए। आप अपना विचार अल्पमत से शुरू किजिए। जनमत निर्माण के लिए संगठन चाहिए। अधिकार सिर्फ विचार की बात नहीं होती है। विचार एक अत्यंत महत्वपुर्ण पक्ष है। लेकिन विचार के साथ साथ संगठन चाहिए। संगठन खुद अपने आप में चैलेंज है।

विचार चाहिए। संगठन चाहिए। नेतृत्व चाहिए। स्ट्रेटेजी और टैक्टिस चाहिए। पैसा चाहिए। हम क्रांति को ठोस बनावें और संगठन पर भी ध्यान दें।

सभास्थल, सड़क, र संसद



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