नेपाल में चिनिया भाषा



मगर प्रदेश में  कामकाजका भाषा मगर भाषा भी हो वो राजनीतिक अधिकार की बात है। सुगमता की भी बात है। बहुत मगर लोग हैं जिन्हे अपने इलाके से बाहर कहीं जाना नहीं। तो उन्हें अपनी सरकार अपने भाषा में सहभागी होने का अधिकार है।

लेकिन नेपाल में बहुत भाषा ऐसे हैं जो बोलचाल के भाषा तो हैं लेकिन इतना विकास नहीं  हो पाया है कि लिखपढ़ हो सके। एक समय नेपाली भाषा की वही हालत थी। अरबो खरबो के लगानी के बाद नेपाली भाषा का विकास हुवा है। तो नेपाल के अन्य भाषाओँ के विकास पर भी खर्चा हो।

और संपर्क भाषा की बात है। नेपाली और हिंदी दो वैसे भाषा हैं।

और कुछ भाषा हैं जो शिक्षा, वाणिज्य के महत्व के हैं। जैसे कि अंग्रेजी। लेकिन धीरे धीरे चीनी भाषा भी वहाँ पर या तो पहुँच रही है या फिर पहुँच गयी है। हाई स्कुल के बाद लोग कौन भाषा सीखेंगे वो तो मार्केट निर्णय करेगी। कुछ लोग जर्मन भाषा सीखेंगे, उनकी मर्जी।

हिंदी का लेकिन विशिष्ट स्थान है। मगर भाषा जैसा ही नहीं उससे भी ज्यादा जटिल। मधेसी पहचान के केंद्रविंदु रहे हिंदी भाषा को अभी तक मान्यता नहीं मिलना बहुत गलत बात है। उसके अलावे संपर्क भाषा। सिर्फ मधेस में ही नहीं पहाड़ में भी। दक्षिण एशिया स्तर पर भी। नेपाल से लोग बहुत जाते हैं भारत काम करने, पढाई लिखाई करने। गूगल सारे इंटरनेट को हिंदी में अनुवाद करने की बात कर रही है। भारत और आर्थिक प्रगति करेगा तो जो नेपाली अमेरिका बेलायत जाते हैं वो भी भारत जाना शुरू कर देंगे १० साल में। हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ का छठा भाषा बनवाना नेपाल के अंतर्राष्ट्रीय मर्यादा से सम्बंधित है।

हिंदी भाषा नेपाल में स्थानीय से क्षेत्रीय से राष्ट्रिय से अन्तर्राष्ट्रिय स्तर तक मायने रखती है। नेपाल विकसित देश बनना है तो हिंदी भाषा अपरिहार्य है।

तो क्या वजह है की हिंदी भाषा के प्रति अभी तक नेपाल के भितर पुर्ण राजनीतिक घृणा के दृष्टि से देखा गया है? Self Hate. आत्म घृणा। नेपाल में हिंदी को घृणा करने वाले खस वही हैं जो शत प्रतिशत सब के सब भारत से आए लोग हैं। ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने जो आत्म घृणा का सबक उन्हें सिखाया उसको वो अभी तक भुल नहीं पाए हैं। शर्म की बात है।

Madhesi Self Hate, Indian Self Hate: One And The Same
Madhesi Self Hate




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