जाए तो जाए कहाँ

गच्छेदार की पार्टी जिस तरह टुटफुट के रह गयी है उसी तरह साढ़े तीन पहाड़ी पार्टी को तोड़फोड़ करना होगा। धनुषा काँग्रेस सब एक ही दिन पार्टी छोड़ दे और घोषणा कर दे तो काँग्रेस पार्टी घुटने पर आ जाएगी। लेकिन समस्या क्या है कि जैसे रुपन्देही  में १३०० मधेसी ने एमाले एक ही दिन में छोड़ दिया कुछ दिन पहले। लेकिन उन्होंने कोई मधेसी पार्टी ज्वाइन नहीं किया। महिनो पहले महोत्तरी में एमाओवादी के १००% लोगो ने पार्टी छोड़ दिया। लेकिन किसी मधेसी पार्टी में  नहीं गए। रौतहट काँग्रेस बगैर पार्टी छोड़े आंदोलन में आने के निर्णय करना चाह रही थी। सुगबुगाहट तो है।

तो क्या है कि काँग्रेस एमाले जैसे पार्टी के जो जिल्ला सभापति होते हैं उन्हें लगता रहता है मेरा हाइट किसी मधेसी मोर्चा के नेता से कम नहीं है। जैसे सप्तरी में मृगेन्द्र यादव ने गच्छेदार छोड़ा लेकिन कोई मधेसी पार्टी ज्वाइन नहीं किया।

तो समस्या का समाधान क्या है? पार्टी खोलो। तराई कम्निष्ट पार्टी। तराई काँग्रेस। ११ बुँदे को १३ बुँदे बनाओ। धर्म निरपेक्षता थपो। और अंगीकृत को सब पद दो। मधेसी मोर्चा को चार पार्टी से बढ़ा के आठ पार्टी करना होगा। नहीं करिएगा तो फिर तराई कम्निष्ट पार्टी और तराई काँग्रेस को कैसे लाइएगा मोर्चा में?

जब तक साढ़े तीन पहाड़ी पार्टी को ये ना लगे कि मधेस मा संगठन ध्वस्त हो रहा है वो लोग सुनने वाले नहीं। जनता को दिक्कत हो तो नेता को दर्द होता है। तो वो होता है लोकतंत्र में। नेपाल में नहीं होता है वैसा। नेपाल में तो जनता को दिक्कत हो तो नेता कालाबाजारी कर के कमाने लग जाते हैं। तो नेता को दिक्कत करना हो तो उनका संगठन ध्वस्त कर दो। अपने आप ठिकाने लग जाएंगे।

कोई जोरजबरजस्ती नहीं लेकिन घर घर दस्तख़त दो। आग्रह करो। पार्टी छोडो। जिल्ला से गाओं लेवल के सब के सब पार्टी छोडो। आंदोलन को उत्कर्ष तक पहुँचाने का सबसे अच्छा रास्ता शायद यही है।


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